
सितंबर 2025 में 1.7 लाख से लेकर अक्टूबर 2025 में 2.2 लाख यूनिट्स का सफ़र दिखाता है कि, कार बाज़ार में किस रफ़्तार से तेज़ी आई है। इसको लेकर कई अहम मुद्दे हैं।
सिएम के ताज़ा आंकड़ों पर नज़र डाले तो पता चलता है कि, सब-4 मीटर कार्स और छोटे एसयूवीज़ की बिक्री में एक बार फिर से बढ़त आई है। यह बढ़ोतरी सिर्फ़ महीने-वार नहीं, बल्कि त्योहारों और जीएसटी में होने वाली कटौती का भी असर है।
सितंबर 2025 में सब-4 मीटर कार/ एसयूवी की बिक्री 1.7 लाख यूनिट्स रही। अक्टूबर 2025 में यह आंकड़ा बढ़कर 2.2 लाख यूनिट्स तक पहुंच गया। यानी सब-4 मीटर कार्स की बिक्री में महीने-दर-महीने म बड़ा उछाल दर्ज किया गया है।
सिएम के आंकड़ों के अनुसार, कुल पैसेंजर वीइकल्स (PV) बिक्री में भी रिकॉर्ड स्तर दर्ज किया गया है। अक्टूबर में कुल पैसेंजर वीइकल्स की बिक्री 4.61 लाख यूनिट्स रही, जिसकी बड़ी वजह फ़ेस्टिव सीज़न और जीएसटी में आए बदलाव हैं।

जीएसटी कटौती का असर
सरकार ने हाल ही में छोटी/ ऐंट्री-लेवल कार्स पर जीएसटी दर को घटाकर 28% से 18% कर दिया है। इस क़दम का असर तुरंत नज़र आया और छोटी कार्स का कुल रीटेल पहले यानी अप्रैल-अक्टूबर तक 16.7% था, जो कटौती के बाद बढ़कर 20-22% तक पहुंच गया है। इस बढ़त का मतलब साफ़ है, कम टैक्स से किफ़ायती ऑन-रोड क़ीमत मिल रही है। जिससे मीडिल क्लास अपने कार लेने का सपना पूरा करने की कोशिश में जुट गया।
बुकिंग्स में उछाल
कई रिपोर्ट्स में बताया गया कि, जिन मॉडल्स की क़ीमतें अब 18% जीएसटी स्लैब में आ गईं, उनकी बुकिंग्स लगभग 50% तक बढ़ीं हैं। कुछ लोकप्रिय ऐंट्री-लेवल मॉडल्स के लिए डीलर-शोरूम में स्टॉक की कमी जैसी स्थिति भी बनी हुई है। यह सीधे तौर पर दिखाता है कि, टैक्स में छूट ने ग्राहकों के बीच कार्स की मांग को बढ़ा दिया है।

क्यों बढ़ रही है छोटी कार्स की मांग
जीएसटी कटौती का असर छोटी कार्स की क़ीमत में सीधे-सीधे कमी लाता है, जिसे ग्राहक एक अच्छे अवसर की तरह देख रहे हैं। साथ ही फ़ेस्टिव सीज़न में भारतीय कार बाज़ार में यूं भी अच्छी-ख़ासी मांग होती है। वहीं,मौक़े का पूरा फ़ायदा उठाने के लिए निर्माताओं ने भी ऐंट्री-लेवल मॉडल्स पर ऑफ़र/ क्विक-डिलिवरी का दबाव बढ़ाया, जिससे बुकिंग्स और डिलिवरी में भी तेज़ी आई। इन सबका नतीजा यह हुआ कि, कई पहली-बार कार ख़रीदने वाले और छोटे-बजट वाले ख़रीदार अब कार ख़रीदने के क़रीब आ गए। कुछ मॉडल्स की क़ीमतें पहले की तुलना में 30 हज़ार से 1.2 लाख रुपए तक तक सस्ती दिखने लगीं।
कार निर्माता और डीलर-नेटवर्क फिर से ऐंट्री-लेवल सेग्मेंट में ज़्यादा फ़ोकस कर रहे हैं, क्योंकि वहां वॉल्यूम और रिटर्न भी अच्छा है।
क्या यह बूम टिकेगा?
अभी के संकेत उत्साहवर्धक हैं, पर कुछ चीज़ों का ध्यान रखना ज़रूरी है। स्टॉक और सप्लाई-चेन्स की भूमिका सबसे अहम् है। अगर निर्माता समय पर डिलिवरी नहीं दे पाएं तो यह बूम अस्थायी रह सकता है। लॉन्ग-टर्म क़ीमतें यानी आर-ओ-आई और इंश्योरेंस की समग्र लागत भी ख़रीदार के फ़ैसले पर असर डाल सकती है।
दूसरी ओर नए लॉन्चेस भी ग्राहकों के फ़ैसले को बदल सकती हैं, क्योंकि, ब्रैंड हर नए लॉन्च के साथ अपने प्रॉडक्ट्स को पहले से बेहतर बनाने में जुटा होता है।
अक्टूबर-2025 का आंकड़ा बताता है कि, जीएसटी-कटौती और त्योहारों के मेल-जोल ने छोटे-कार मार्केट में बड़ा असर डाला है। सिएम और बाज़ार रिपोर्ट्स यही संकेत दे रहे हैं कि, यह सिर्फ़ एक छोटा उछाल नहीं, बल्कि टैक्स-नीति और ग्राहक-भावनाओं का मिला-जुला परिणाम है, जो इस दौरान तो ग्राहक और ब्रैंड्स दोनों के लिए ही सकारात्मक नतीजे दे रहा है।















































